मेरी आवश्यकता के अनुकूल,
क्यों खिलेंगे पतझड़ में फूल?
क्या करने को मेरी इच्छापूर्ति,
बोल उठेगी मौन यह मूर्ति?
अपनी कठोरता त्याग कुलिश,
वंदना से होगा कपास सरिस?
सूरज की यह धधकती ज्वाला,
है बन सकती क्या हिम शाला?
यदि हो मेरी ऐसी सुदृढ़ मति,
समय थामेगा क्या अपनी गति?
मेरी कल्पना को देने आकार,
कैसे तजेगी यामिनी अंधकार?
अति अगाध यह समुद्र अपार,
क्यों देगा मार्ग सुन मेरी पुकार?
पाकर मेरा स्पर्श धातु अवर्ण,
क्या बन जाएगा सरिस स्वर्ण?
पूरी करने को मेरी अभिलाषा,
काग बोलेंगे मृदु, मधुर भाषा?
अगर इच्छा हो जाए ऐसी मेरी,
क्यों न हो पूनम रात अँधेरी?
मेरी जिह्वा का करने संतोष,
लोन होगा मधु तज निज दोष?
मेरी प्रार्थना को करके फलित,
कहो, हो जाएगा धवल असित?
जिसके सुख का साधन गैर है,
उसका निश्चित स्वयं से वैर है।
झूठी इच्छाओं के जो अधीन,
क्यों न होगी मेरी दशा दीन!
तथापि यह उतना सरल नहीं,
जग की स्वार्थ पूर्ण रीत यही।
नहीं समझे यह मेरी विपदा,
लगता सबको मुझे सुख सदा।
अपने कष्टों की रात मैं जानूँ,
यहाँ कहाँ उदित आनंद भाँनू!
ये कैसा आंतरिक द्वंद्व सहूँ,
ख़ुद से ही मौन मैं कैसे रहूँ?
अंतर्मन की यह पीड़ा मेरी,
है विषधर अथवा रस्सी अंधेरी।
क्या यह सब मिथ्या बोध है?
या सहायता का अनुरोध है?
क्या सदा मुखौटा धर जाऊँ,
हर दर्द को हँसकर अपनाऊँ?
इन अश्रु का क्या उपचार करुँ?
क्या समय के आश्रय में रहूँ?
चलूँ मैं किसकी बाँह पकड़?
रोऊँ मैं किसका वक्ष जकड़?
यह कैसा मेरा भाग्य हुआ?
नियति के पाश का बंधुआ!
ना सुख चैन, ना शांति कही,
क्या जीवन केवल वेदन ही?
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